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Zindagi se mulakat

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आज फिर किसी रोज़ ज़िन्दगी से मुलाकात करने का मौका मिला, आज वो सज धज कर आईने में आ ठहरी; मेरी शक्ल में, बेखौफ सी, जिसको कोई भी डर नहीं किसी चीज का, जो खुद के इरादों में साफ थी!जो बातों में तर्रार थी, और सुनने में तेज़, जिसके ऊपर शर्म का लिबास था और उस लिबास पर बेशर्मी की सुरकतें पड़ी थी। वो ज़िन्दगी आज कुछ कहना चाह रही थी, कुछ ऐसा जो शायद सुनने को बहुत तीखा हो, जो सुनकर शायद वापस कभी कुछ सुनने का मन ना करे। वो झांक रही थी अपनी आंखो से, कुछ ऐसे की मानो में एक मुजरिम हूं, कोई जुल्म किया है मैंने उसपर। अब जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है, हां जुल्म हि किया है मैंने, हर बार हर किसि की परवाह करते करते, मैंने उसको कभी वक़्त दिया ही नहीं, जो सपने सजाए रखे थे, उनको हमेशा पूरा होने नहीं दिया। जो बातें मुझे कर लेनी चाहिए थी, उन बातों को हमेशा आधा छोड आया।  तुम इसे डर कहोगे और में इसे दगाबाजी; दगाबाजी खुद की जिंदगी से। जिन लम्हों को खुल कर जी सकता था मै, उन लम्हों में हर बार अपने मुस्तकबिल के बारे में सोचता रहा। आज जब वो आई है, बात करने तो आंखे मिलाने की भी हिममत नहीं हो रही। बस...